नीदरलैंड्स की लाइडन यूनिवर्सिटी की एसोसिएट प्रोफ़ेसर जेनी आउड्रिंग को NWO L अनुदान मिला है, ताकि वे शब्दों और व्याकरण नियमों के उस मानसिक नेटवर्क को फिर से रच सकें जिसे वक्ता अनजाने में इस्तेमाल करते हैं।
परियोजना इस नेटवर्क का डिजिटल मॉडल बनाएगी, जिसमें शब्दों के भीतर के व्याकरण, यानी रूपविज्ञान, पर ध्यान होगा। आउड्रिंग शब्द-व्याकरण का एक डच «कंस्ट्रक्टिकॉन» बनाना चाहती हैं, जिसे वे दुनिया में अपनी तरह का पहला बताती हैं।
यह काम डच भाषा संस्थान के डेटाबेस और लाइडन की रूपविज्ञान परंपरा पर आधारित है, और be-, ver-, -baar और -je जैसे उपसर्गों व प्रत्ययों पर केंद्रित है।


