बेंगलुरु स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc) के सूक्ष्मजीव विज्ञान और कोशिका जीव विज्ञान विभाग के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी विधि बनाई है जो नीली रोशनी से कोशिका विभाजन के एक अहम हिस्से को सक्रिय करती है। इसका नाम LISA है, यह EMBO Reports पत्रिका में प्रकाशित हुई और IISc ने 29 सितंबर 2026 को इसकी जानकारी दी।
कोशिका जब विभाजित होती है तो स्पिंडल नाम की एक संरचना बनाती है, जो आनुवंशिक सामग्री को दो नई कोशिकाओं में बाँटती है। यह संरचना ऑरोरा A एंजाइम पर निर्भर करती है। टीम ने इसे रोशनी पर प्रतिक्रिया देने वाले एक पौधे के प्रोटीन से जोड़ा: नीली रोशनी में अणु एक साथ जुटते हैं, एंजाइम सक्रिय होता है और स्पिंडल बनना शुरू हो जाता है। रोशनी बंद करने पर यह असर खत्म हो जाता है।
जिन मानव कोशिकाओं से सेंट्रोसोम हटा दिया गया था, जो आमतौर पर स्पिंडल को व्यवस्थित करता है, उनमें नीली रोशनी से स्पिंडल फिर बन गया और विभाजन की गड़बड़ियाँ ठीक हो गईं। पहले की विधियाँ मुख्य रूप से मेंढक के अंडों के अर्क में काम करती थीं, जबकि LISA जीवित कोशिकाओं और कई तरह की कोशिकाओं में काम करती है।
इस काम का नेतृत्व प्रोफ़ेसर सचिन कोटक ने किया, और पीएचडी छात्र विग्नेश ओलक्कल पहले लेखक हैं। कई ठोस ट्यूमरों में ऑरोरा A ज़्यादा मात्रा में होता है, और टीम को उम्मीद है कि यह विधि अधिक सटीक दवाएँ बनाने में मदद करेगी। अभी तक परीक्षण केवल प्रयोगशाला में मानव कोशिकाओं पर हुए हैं।


