मनुष्यों और चिंपैंज़ी के जीनोम 98 प्रतिशत से अधिक समान हैं, लेकिन अब तक यह जानने का कोई तरीक़ा नहीं था कि किन अंतरों का वास्तविक जैविक असर होता है। मैकगिल विश्वविद्यालय, क्योटो विश्वविद्यालय और वाइज़मैन विज्ञान संस्थान के शोधकर्ताओं द्वारा नेचर पत्रिका में प्रकाशित नया आनुवंशिक एटलस पहली बार इसे व्यवस्थित रूप से जाँचना संभव बनाता है।
कंकाल कोशिकाओं पर पहले परीक्षण में टीम ने लाखों डीएनए अंतरों की जाँच की और पाया कि उनमें से हज़ारों जीनों की गतिविधि बदलते प्रतीत होते हैं। नतीजे बताते हैं कि मनुष्यों में वे अणु कम विकसित हुए जो उपास्थि को पानी रोकने और दबाव सहने में मदद करते हैं।
प्रोफ़ेसर गियोम बोर्क कहते हैं कि इस बदलाव ने मानव कंकाल को आकार देने में मदद की होगी, पर यह भी समझा सकता है कि हम ऑस्टियोआर्थराइटिस और ऑस्टियोपोरोसिस जैसी बीमारियों के प्रति अधिक संवेदनशील क्यों हैं, यानी एक “विकासवादी समझौता”। टीम अब इस तरीक़े को अन्य कोशिकाओं, ख़ासकर मस्तिष्क, पर लागू करना चाहती है।


