भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास (IIT Madras) के नेतृत्व में हुए एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन में पाया गया कि हवा में तैरते सूक्ष्म कणों यानी एरोसोल को ध्यान में रखने से भारी बारिश और उससे शहरों में आने वाली बाढ़ का सिमुलेशन काफ़ी बेहतर होता है। यह काम Natural Hazards and Earth System Sciences पत्रिका में प्रकाशित हुआ और संस्थान ने 5 अक्टूबर 2026 को इसकी जानकारी दी।
टीम ने दिसंबर 2015 में चेन्नई की भारी बारिश और बाढ़ को केस स्टडी के रूप में लिया। उसने एरोसोल और उन कणों को, जिन पर बादलों की बूँदें बनती हैं, एक उच्च-रिज़ॉल्यूशन मौसम मॉडल में शामिल किया और फिर सिमुलेटेड बारिश को अडयार नदी बेसिन के जल-विज्ञान और बाढ़ मॉडलों में डाला।
नतीजा यह रहा कि एरोसोल के बिना वाले सिमुलेशन की तुलना में बेसिन पर सिमुलेटेड बारिश में लगभग 22% और डूबे क्षेत्र की सटीकता में लगभग 50% सुधार हुआ। जर्मनी के GFZ भू-विज्ञान केंद्र, जापान की अंतरिक्ष एजेंसी JAXA और नेपाल के काठमांडू विश्वविद्यालय ने भी इसमें भाग लिया।
लेखकों का कहना है कि यह तरीका अभी चालू पूर्वानुमान प्रणाली नहीं है। इसे दूसरी बारिशों और दूसरे शहरों में परखना, एरोसोल का बेहतर मापन करना और गणनाओं को तेज़ बनाना ज़रूरी है। ऐसा होने पर यह भारी बारिश के दौरान जलाशयों में पानी रोकने या छोड़ने का फ़ैसला समय पर लेने में मदद कर सकता है।


